Friday, August 19, 2011

प्रेम-वीणा का अछुता तार


साहित्य अकादमी पुरस्कार प्राप्त कवि, कथाकार और एकांकीकार आरसी प्रसाद सिंह की जन्मतिथि पर पेश है उनकी ग़ज़लें


रजनीगंधा संग्रह से...

तुम्हारी प्रेम-वीणा का अछुता तार मैं भी हूँ 
मुझे क्यों भूलते वादक विकल झंकार मैं भी हूँ


मुझे क्या स्थान-जीवन देवता होगा न चरणों में 
तुम्हारे द्वार पर विस्मृत पड़ा उपहार मैं भी हूँ


बनाया हाथ से जिसको किया बर्बाद पैरों से 
विफल जग में घरौंदों का क्षणिक संसार मैं भी हूँ

खिला देता मुझे मारूत मिटा देतीं मुझे लहरें 
जगत में खोजता व्याकूल किसी का प्यार मैं भी हूँ

कभी मधुमास बन जाओ हृदय के इन निकुंजों में 
प्रतिक्षा में युगों से जल रही पतझाड़ मैं भी हूँ

सरस भुज बंध तरूवर का जिसे दुर्भाग्य से दुस्तर 
विजन वन वल्लरी भूतल-पतित सुकुमार मैं भी हूँ
  

दिल ही तो है...

दिल हमारा लापता है शाम से 
कर रहा है क्या
 ? गया किस काम से

दर्द ले कर दिल हमारा ले लिया 
हो गये दोनों बड़ी अंजाम से

लाश में ही जान अब तो डालिये 
एक भी बाक़ी न कत्लेआम से

आप हों चाहे न जितनी दूर क्यों ?
जी रहे हम आपके ही नाम से

ज़िंदगी गुज़री मुसीबत से भरी 
मर गये हम तो बहुत आराम से

गीत-ग़ज़ल...

हो गयी हैं चार आँखें यार से  
लड़ गयी तलवार क्यों तलवार से

आप क्या हैं ? आपको मालूम क्या ? 
पूछिये अपने किसी बीमार से

प्यार का कुछ और ही दस्तूर है 
रंग लाता और कुछ तकरार से

मौत ने क्यों कर दिया हमको अलग ?
हम कभी चिपके न थे संसार से

शत्रु को हरगिज न छोटा जानिये 
जल गया घर एक ही अंगार से

किस बला का नाम औरत रख दिया ? 
कौन बचता है दुतर्फ़ा धार से

ज़िंदगी ही जब सलामत है नहीं 
माँग क्या कुछ और हो सरकार से

जो बनी अपनी हिफ़ाजत के लिए 
हम गये टकरा उसी दीवार से

आदमी हम भी कभी थे काम के 
गो कि लगते हैं कभी बेकार से

अब कमर कस कूच करना चाहिये 
आ रही आवाज़ सीमा पार से

अजनबी की आवाज़...

आपके इस शहर में गुज़ारा नहीं 
अजनबी को कहीं पर गुज़ारा नहीं

बह गया मैं अगर, तो बुरा क्या हुआ ? 
खींच लेती किसे तेज़ धारा नहीं

आरज़ू में जनम भर खड़ा मैं रहा 
आपने ही कभी तो पुकारा नहीं

हाथ मैंने बढ़ाया किया बारहा 
आपको साथ मेरा गवारा नहीं

मौन भाषा हृदय की उन्हें क्यों छुए ? 
जो समझते नयन का इशारा नहीं

मैं भटकता रहा रौशनी के लिए 
गगन में कहीं एक तारा नहीं

लौटने का नहीं अब कभी नाम लो 
सामने है शिखर और चारा नहीं

बस, लहर ही लहर एक पर एक है 
सिंधु ही है
, कहीं भी किनारा नहीं

ग़ज़ल की फसल यह इसी खेत की 
किसी और का घर सँवारा नहीं

1 Comments:

प्रभात रंजन said...

बड़ी अच्छी गज़लें हैं. आरसी बाबु की स्मृति को नमन.