Friday, May 20, 2011

तुम हो मगर नहीं मिलते


तुम्हारी तमन्ना
जैसे बुझे हुए चिराग़ों से रौशनी माँगना
तुम्हारी दीद
जैसे अमावस की शब पूर्णिमा का तस्सवुर करना
तुम्हारा लम्स
जैसे छत पर लेटे हुए सितारों को चूम लेना
तुम्हारी इबादत
जैसे कर रहा हूँ तसल्ली के लिए सिर्फ़
और जी रहा हूँ यही सोच कर
कि कभी किसी को ख़ुदा नहीं मिलता
सच तो ये है
तुम अक्सर दिखाई देते हो 
ग़म तो ये है
कि तुम हो मगर नहीं मिलते !  
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3 Comments:

संगीता स्वरुप ( गीत ) said...

खूबसूरती से लिखे एहसास

हमारीवाणी said...

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लीना मल्होत्रा said...

सच तो ये है
तुम अक्सर दिखाई देते हो
ग़म तो ये है
कि तुम हो मगर नहीं मिलते ..दिल से कही हुई बाते अक्सर कविता बन जाती हैं.