एक वादा निबाहना है मुझे
उम्र भर तुमको चाहना है मुझे
उम्र भर तुमको चाहना है मुझे
अब तो सदियों नहीं मिलोगी तुम
अब तो सदियों कराहना है मुझे
अब तो सदियों कराहना है मुझे
तेरी खुशियों को चूम कर लब से
तेरे ग़म को सराहना है मुझे
किसी भी सिम्त अब सफ़र क्यों हो
आपकी सिम्त राह ना है मुझे
मेरी चाहत में जंग लग-सी गई
कोई पूछे कि आह ना है मुझे
उम्र भर जिसको चाहना है मुझे

4 Comments:
त्रिपुरारी शर्मा जी!
नाम आपका है त्रिपुरारी।
दूर फेक दो ये लाचारी॥
सीखा जिसने आप उबरना
वो ही नर है, वो ही नारी॥
बहुत अच्छी ग़ज़ल।
बहुत खूब ...आज के मौसम के मिजाज़ की ग़ज़ल
bahut khoob..
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