Wednesday, July 20, 2011

एक वादा निबाहना है मुझे


एक वादा निबाहना है मुझे
उम्र भर तुमको चाहना है मुझे 

अब तो सदियों नहीं मिलोगी तुम
अब तो सदियों कराहना है मुझे 

तेरी खुशियों को चूम कर लब से 
तेरे ग़म को सराहना है मुझे 

किसी भी सिम्त अब सफ़र क्यों हो 
आपकी सिम्त राह ना है मुझे 

मेरी चाहत में जंग लग-सी गई
कोई पूछे कि आह ना है मुझे 

एक भोली-सी आँख की मस्ती
उम्र भर जिसको चाहना है मुझे

4 Comments:

डॉ० डंडा लखनवी said...

त्रिपुरारी शर्मा जी!
नाम आपका है त्रिपुरारी।
दूर फेक दो ये लाचारी॥
सीखा जिसने आप उबरना
वो ही नर है, वो ही नारी॥

मनोज कुमार said...

बहुत अच्छी ग़ज़ल।

Sonal Rastogi said...

बहुत खूब ...आज के मौसम के मिजाज़ की ग़ज़ल

Sw@t! B@ns@l said...

bahut khoob..