Tuesday, September 06, 2011

एक दिन मिलना होगा




मैं घोषणा करता हूँ  कि उजाला और अंधेरा 
तुम्हारी आँखों का खुलना और बंद होना है
तुमने देखा है कभी उगते हुए सूरज को ?
तुम्हारी आँख से निकलता है
और डूब जाता है शाम होते ही
तुम्हारी ही दूसरी आँख में
रोज़ सुबह रोशनी की पहली बूँद
आकर गिरती है मेरी बंज़र पलकों पर
इसी के साथ रोशन होती है ज़िंदगी
खुलती है एक खिड़की
नज़र आती है एक नई दुनिया
जहाँ शब्दों का एक जंगल है
एक झाड़ी के पीछे छुपता हुआ मैं
और बुझता हुआ मेरे वजूद का दीया
जलने लगता है तुम्हारे छूते ही
तुम- मैं तुमसे मिलने आई हूँ
मैं- यहाँ पर कब नहीं थी तुम
तुम- तेरा ख़्याल चुभता है
मैं- चुभन भी राहत देती है
तुम- तेरे बिन रहा नहीं जाता
मैंमगर रहना तो पड़ता है
जैसे रात-दिन ज़िंदा हैं
महज इस उम्मीद पर
कि एक दिन मिलना होगा
और फिर बाहों में भर कर खूब रोएंगे !  

3 Comments:

Patali-The-Village said...

बहुत सुन्दर भावपूर्ण रचना| धन्यवाद|

दिगम्बर नासवा said...

सूरज के उगने डूबने को क्रम को कवि की कल्पना ही ऐसे जोड़ सकती है ... प्रभावी रचना ...

abhi said...

शानदार!!!