Tuesday, October 18, 2011

आज ‘मजाज़ लखनवी’ का जन्मदिन

आज (19 अक्टूबर) मशहूर शायर 'मजाज़ लखनवी' का जन्मदिन है। 1911 को रूदौली गाँव (बाराबंकी) उत्तरप्रदेश, भारत में पैदा हुए इस शायर ने अपनी शायरी से करोड़ों लोगों को अपना दीवाना बनाया। पेश है मजाज़ की कुछ ग़ज़लें – त्रिपुरारि कुमार शर्मा 

1.

अपने दिल को दोनों आलम से उठा सकता हूँ मैं
क्या समझती हो कि तुमको भी भुला सकता हूँ मैं



कौन तुमसे छीन सकता है मुझे क्या वहम है
खुद जुलेखा से भी तो दामन बचा सकता हूँ मैं



दिल मैं तुम पैदा करो पहले मेरी सी जुर्रतें
और फिर देखो कि तुमको क्या बना सकता हूँ मैं


दफ़्न कर सकता हूँ सीने मैं तुम्हारे राज़ को
और तुम चाहो तो अफ़साना बना सकता हूँ मैं

तुम समझती हो कि हैं परदे बहुत से दरमियाँ
मैं यह कहता हूँ कि हर पर्दा उठा सकता हूँ मैं

तुम कि बन सकती हो हर महफ़िल मैं फिरदौस-ए-नज़र
मुझ को यह दावा कि हर महफ़िल पे छा सकता हूँ मैं

2.
कमाल-ए-इश्क़ है दीवाना हो गया हूँ मैं
ये किस के हाथ से दामन छुड़ा रहा हूँ मैं

तुम्हीं तो हो जिसे कहती है नाख़ुदा दुनिया
बचा सको तो बचा लो कि डूबता हूँ मैं

ये मेरे इश्क़ की मजबूरियाँ म'अज़-अल्लाह
तुम्हारा राज़ तुम्हीं से छुपा रहा हूँ मैं

इस इक हिजाब पे सौ बे-हिजाबियाँ सदक़े
जहाँ से चाहता हूँ तुमको देखता हूँ मैं

बताने वाले वहीं पर बताते हैं मंज़िल
हज़ार बार जहाँ से गुज़र चुका हूँ मैं

कभी ये ज़ोम कि तू मुझ से छुप नहीं सकता
कभी ये वहम कि ख़ुद भी छुपा हुआ हूँ मैं

मुझे सुने न कोई मस्त-ए-बादा-ए-इशरत
'मज़ाज़' टूटे हुये दिल की इक सदा हूँ मैं

3.
ख़ुद दिल में रह के आँख से पर्दा करे कोई
हाँ, लुत्फ़ जब है पाके भी ढूँढा करे कोई

तुम ने तो हुक्म-ए-तर्क-ए-तमन्ना सुना दिया
किस दिल से आह तर्क-ए-तमन्ना करे कोई

दुनिया लरज़ गई दिल-ए-हिरमाँ नसीब की
इस तरह साज़-ए-ऐश न छेड़ा करे कोई

मुझ को ये आरज़ू वो उठायें नक़ाब ख़ुद
उन को ये इन्तज़ार तक़ाज़ा करे कोई

रन्गीनी-ए-नक़ाब में ग़ुम हो गई नज़र
क्या बे-हिजाबियों का तक़ाज़ा करे कोई

या तो किसी को जुर्रत-ए-दीदार ही न हो
या फिर मेरी निगाह से देखा करे कोई

होती है इस में हुस्न की तौहीन ऐ 'मज़ाज़'
इतना न अहल-ए-इश्क़ को रुसवा करे कोई


4.
सीने में उन के जलवे छुपाये हुये तो हैं
हम अपने दिल को तूर बनाये हुये तो हैं

तासीर-ए-जज़्ब-ए-शौक़ दिखाये हुये तो हैं
हम तेरा हर हिजाब उठाये हुये तो हैं

हाँ वो क्या हुआ वो हौसला-ए-दीद अहल-ए-दिल
देखो न वो नक़ाब उठाये हुये तो हैं

तेरे गुनाहाअर गुनाहगार ही सही
तेरे करम की आस लगाये हुये तो हैं

अल्लाह रे क़ामयाबी-ए-आवारगान-ए-इश्क़
ख़ुद गुम हुये तो क्या उसे पाये हुये तो हैं

ये तुझ को इख़्तियार है तासीर दे न दे
दस्त-ए-दुआ हम आज उठाये हुये तो हैं

मिटते हुओं को देख के क्यों रो न दें 'मज़ाज़'
आख़िर किसी के हम भी मिटाये हुये तो हैं

1 Comments:

रविकर said...

बहुत सुन्दर प्रस्तुति ||
मेरी बधाई स्वीकार करें ||

यह मेरी 10 वी टिप्पणी ||
आभार ---
जो यह अवसर मिला ||

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RUDAULI, FAIZABAD